दिमाग की हर आवाज़ सच नहीं होती जानिए अंतर्ज्ञान (Intuition) और मन के भ्रम का अंतर ।

क्या आपके दिमाग में भी अचानक कोई काम करने का विचार आता है, लेकिन अतीत का अनुभव नुकसान की गवाही देता है ? जानिए ऐसी स्थिति में सही फैसला कैसे लें ।

दिमाग की हर आवाज़ सच नहीं होती । जब मन कहे कुछ और, और तजुर्बा कहे कुछ और... तब क्या करें ?

​कई बार हमारे साथ एक अजीब खेल होता है । आप चुपचाप बैठे हैं और अचानक दिमाग में एक बेहद स्पष्ट आवाज़ गूँजती है चलो, यह काम कर लेते हैं । ऐसा लगता है जैसे अंदर से कोई गाइड कर रहा हो ।

​लेकिन जैसे ही आप कदम आगे बढ़ाने लगते हैं और अतीत के पन्नों को पलटकर देखते हैं (Flashback में जाते हैं), तो आपका दिल बैठ जाता है । आपका पुराना कड़वा अनुभव चीख-चीखकर कहता है रुक जाओ । पिछली बार भी यही रास्ता चुना था और भारी नुकसान हुआ था ।

​अब आप एक दोराहे पर खड़े हैं । एक तरफ वो स्पष्ट विचार है जो आपको खींच रहा है, और दूसरी तरफ आपका बीता हुआ कल (Past) है जो आपको चेतावनी दे रहा है ।

​ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिए ? उस आवाज़ को सुनें या उसे इग्नोर कर दें ? आइए इसे गहराई से समझते हैं ।

​1 अंतर्ज्ञान (Intuition) और दिमाग की चाल (Mind Tricks) का अंतर समझें ।

​सबसे बड़ी गलती जो हम करते हैं, वो यह है कि हम दिमाग में आने वाले हर विचार को अपनी अंतरआत्मा की आवाज़ मान लेते हैं । जबकि ऐसा नहीं है ।

​सच्चा अंतर्ज्ञान (Intuition)।

यह बहुत शांत, गहरा और सुरक्षित महसूस कराता है । यह आपको कभी जल्दबाजी में कोई ऐसा कदम उठाने को नहीं कहेगा जिससे आपका नुकसान हो । यह आपको खतरे से बचाता है ।

​मन का भ्रम या आवेग (Impulse) ।

यह आवाज़ बहुत तेज, बेचैन करने वाली और अंधी होती है । यह अक्सर पुरानी बुरी आदतों, लालच, शॉर्टकट की चाहत या किसी डर की वजह से पैदा होती है । यह कहती है, बस अभी कर डालो ।

​थम्ब रूल ।

अगर किसी काम को करने की आवाज़ अंदर से आ रही है, लेकिन उसे सोचते ही पुराना नुकसान याद आ रहा है, तो वो अंतर्ज्ञान नहीं है । वो दिमाग की एक पुरानी आदत या चाल (Pattern) है जो आपको वापस उसी गड्ढे में गिराना चाहती है ।

​2 जब पुराना तजुर्बा नुकसान दिखाए, तो क्या करें ?

​इसका सीधा और साफ जवाब है, उस आवाज़ को पूरी तरह इग्नोर (Ignore) करें और अपने तर्क को ढाल बनाएं ।

​तजुर्बा (Experience), ज़िंदगी का सबसे बड़ा शिक्षक है । अगर इतिहास गवाह है कि उस रास्ते पर चलने से पहले भी आपका नुकसान हुआ था, तो इस बार परिणाम अलग नहीं होगा । खुद को इन 3 स्टेप्स से संभालें ।

​० 5-मिनट का पॉज़ (The Pause Rule) ।

​जब भी ऐसा कोई तीव्र विचार आए, तुरंत एक्शन मोड में मत आइए । वहीं रुकिए । लंबी सांस लीजिए और खुद को 5 से 10 मिनट का समय दीजिए । आवेग (Impulse) का गुब्बारा कुछ ही मिनटों में फूट जाता है ।

​० कागज़ पर सच लिखिए (Fact-Check Matrix) ।

​दिमाग में चल रही उलझन को दूर करने का सबसे बेस्ट तरीका है, उसे कागज़ पर उतार देना । एक पेन उठाइए और लिखिए ।

​दिमाग क्या कह रहा है ? (उदाहरण-यह बिजनेस/काम दोबारा शुरू कर दो, मज़ा आएगा ।)

​हकीकत (अतीत) क्या कहती है ? (उदा. पिछली बार बिना तैयारी के किया था, तो समय और पैसा दोनों डूबे थे ।)

​जब आप आँखों के सामने सच लिखा हुआ देखते हैं, तो दिमाग का वो भ्रम तुरंत टूट जाता है ।

​० माइंडफुलनेस, एक दर्शक बनें, भागीदार नहीं ।

​अपने दिमाग से कहिए ठीक है, मुझे तुम्हारा विचार सुनाई दिया । लेकिन मेरा विवेक कहता है कि यह मेरे लिए सही नहीं है । इसलिए मैं इस पर कोई एक्शन नहीं लूँगा । विचार को आने दीजिए और बादलों की तरह गुज़र जाने दीजिए । उसके साथ बहिए मत ।

जब रफ्तार बढ़ने लगती है तो मानसिकता का खेल शुरू होता है ।

​निष्कर्ष-आप अपने विचारों से बड़े हैं ।

​आपका दिमाग एक बेहतरीन सर्वेंट (नौकर) है, लेकिन एक बहुत बुरा मास्टर (मालिक) है । उसे अपनी ज़िंदगी के फैसले मत लेने दीजिए । फैसले आपके विवेक (Wisdom) और अनुभव (Experience) के आधार पर होने चाहिए ।

​अगर भूतकाल साफ तौर पर इशारा कर रहा है कि उस रास्ते पर नुकसान है, तो उस स्पष्ट दिखने वाली आवाज़ को एक धोखा मानकर छोड़ देना ही आपकी सबसे बड़ी जीत है ।

​क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि मन ने कुछ कहा और बाद में आपको पछताना पड़ा ? अपने अनुभव नीचे कमेंट में ज़रूर शेयर करें ।

Post a Comment

0 Comments