क्या हम सच में परमात्मा से प्यार करते हैं या सिर्फ उनके दिए धन से? एक आत्म-मंथन।

नमस्कार आज की यह पोस्ट और वीडियो हमारे जीवन की एक ऐसी कड़वी सच्चाई को दर्शाती है जिससे हम सब कहीं न कहीं भाग रहे हैं। हम दिन-रात भगवान की पूजा करते हैं, मंदिर जाते हैं, लेकिन क्या हम सच में उनकी बात मानते हैं ?

हमारी आस्था का खोखला सच।
हम सब सुबह उठते हैं, स्नान करते हैं, धूप-अगरबत्ती जलाते हैं, और हाथ जोड़कर भगवान के सामने खड़े हो जाते हैं। सनातन और हिंदू धर्म में, या किसी भी अन्य मत में, पूजा-पाठ, अनुष्ठान और ईश्वर का स्मरण हमारे दैनिक जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। हम सब परमात्मा का भजन करते हैं, मंदिरों में लाइन लगाते हैं, और यह दावा करते हैं कि हम ईश्वर के परम भक्त हैं।


लेकिन क्या आपने कभी शांत दिमाग से बैठकर खुद से यह सवाल पूछा है, कि हम सच में परमात्मा से प्यार करते हैं, या सिर्फ उस सुख-समृद्धि और धन-दौलत से प्यार करते हैं जो हम उनसे मांगते हैं ?
आज का मानव कर्म तो करता है, लेकिन उन कर्मों के पीछे की नीयत में स्वार्थ और लालसाएं छिपी होती हैं। हम भगवान के आगे सिर झुकाकर अपने दैनिक कार्यों में लग जाते हैं, लेकिन जैसे ही हम मंदिर की चौखट से बाहर पैर रखते हैं, हमारा व्यवहार, हमारे कर्म और हमारी ईमानदारी कहीं पीछे छूट जाती है। यह वीडियो और यह लेख उन्हीं खोजी आत्माओं के लिए है जो इस सतही पूजा-पाठ से ऊपर उठकर वास्तव में सत्यता के मार्ग पर चलना चाहते हैं।

1 जब परमात्मा द्वार पर आते हैं, तो हम उन्हें पहचान क्यों नहीं पाते ?
हम अक्सर शिकायत करते हैं कि भगवान केवल सतयुग में आते थे, आज के कलयुग में भगवान किसी को दर्शन क्यों नहीं देते ? लेकिन सच तो यह है कि प्रकृति और परमात्मा हमें सुधारने का, सही मार्ग पर लाने का मौका हर रोज देते हैं।

परमात्मा साक्षात चतुर्भुज रूप में शंख-चक्र-गदा लेकर शायद आपके सामने न आएं, लेकिन वे किसी न किसी माध्यम से, किसी न किसी रूप में हमारे जीवन में दस्तक जरूर देते हैं।
याद कीजिए, क्या कभी आपके जीवन में कोई ऐसा सीधा-सच्चा व्यक्ति नहीं आया जिसने आपको गलत काम करने से रोका हो ? क्या कभी किसी संत, किसी सच्चे मित्र या किसी भले इंसान ने आपको आगाह नहीं किया कि यह रास्ता गलत है, इस तरह से मत जियो, बेईमानी का रास्ता छोड़ दो ?

निश्चित रूप से आया होगा। लेकिन तब हम क्या करते हैं ? हम उनकी सीधी और सच्ची बातों को अनसुना कर देते हैं। हम उन्हें पुराना ख्याल या मूर्ख समझकर अपनी ही बातों को दोहराने लगते हैं और अपने अहंकार को सही साबित करने में जुट जाते हैं। हम उस सच्चे इंसान को अपने जीवन से दूर कर देते हैं।
जरा रुकिए और सोचिए। क्या पता उस सीधे-सच्चे इंसान के भीतर स्वयं परमात्मा ही विराजमान थे ? क्या पता हमारी पूजाओं और प्रार्थनाओं के जवाब में भगवान ने ही उस व्यक्ति को एक मार्गदर्शक बनाकर हमारे पास भेजा था ताकि वे हमें दिव्य ऊर्जाएं दे सकें ? लेकिन हमने अपने भरण-पोषण और दुनियावी सुखों के जाल में फंसकर उन दिव्य संकेतों को पहचानना ही छोड़ दिया।

2 दूषित धन और मनुष्य का दोहरा चरित्र।
ईश्वर को पाने की सबसे पहली शर्त है, पवित्रता। लेकिन आज का इंसान एक अजीब विरोधाभास में जी रहा है। एक तरफ वह भगवान को अपनाना चाहता है, उनकी कृपा पाना चाहता है, और दूसरी तरफ वह ऐसे कार्य करता है जो परमात्मा को कभी प्रिय हो ही नहीं सकते।

परमात्मा को झूठ, कपट, छल और बेईमानी से कमाया गया दूषित धन कभी नहीं चाहिए। कोई भी धर्म यह नहीं सिखाता कि आप गरीबों का हक मारें, भ्रष्टाचार करें और फिर उस पैसे का एक छोटा सा हिस्सा मंदिर के दान-पात्र में डाल दें। भगवान आपके पैसों के भूखे नहीं हैं।

सोचिए, आज यदि स्वयं परमात्मा साक्षात आपके सामने प्रकट हो जाएं और बड़े प्रेम से आपका हाथ पकड़कर कहें, वत्स, यह जो धन तुमने गलत तरीके से कमाया है, यह दूषित है। इसमें बुराइयां छिपी हैं, यह तुम्हारे परिवार का विनाश कर देगा, इसलिए इसका त्याग कर दो।
तो आपका पहला कदम क्या होगा ? क्या आप उस धन को तुरंत छोड़ देंगे ?

कड़वा सच तो यह है कि आज का मनुष्य उस धन के मोह में इतना अंधा हो चुका है कि वह स्वयं ईश्वर को ही धक्का देकर अपने घर से बाहर निकाल देगा। यह बात सुनने में बहुत कठोर और कड़वी लग सकती है, और इसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ, लेकिन अगर हम अपने अंतर्मन में झांकें, तो पाएंगे कि हम हर रोज अपने लालच के कारण परमात्मा को ठुकरा रहे हैं।
 

3 प्रकृति और परमात्मा के खिलाफ हमारा युद्ध।
जब हम लालच में अंधे होकर भ्रष्टाचार और बेईमानी का रास्ता चुनते हैं, तो हम केवल किसी व्यक्ति को धोखा नहीं दे रहे होते, बल्कि हम प्रकृति और परमात्मा के शाश्वत नियमों के खिलाफ चल रहे होते हैं।

आज हमने अपने कर्मों से न केवल अपने समाज को, बल्कि इस पूरी सुंदर प्रकृति को दूषित कर दिया है। हवा, पानी, मिट्टी सब कुछ हमारे लालच की भेंट चढ़ चुका है। जब हम भीतर और बाहर दोनों तरफ से इतने दूषित हो जाएंगे, तो हमारे भीतर परमात्मा की ऊर्जाओं का संचार कैसे होगा ?

यदि हमारे पात्र (मन) में पहले से ही गंदगी और लालच भरा हुआ है, तो उसमें ईश्वर की कृपा का अमृत कैसे समा सकता है ? फिर हमारे पास केवल हमारा यह भौतिक समाज और हमारी दुनियावी परेशानियां ही बचेंगी। वह दिव्य आनंद, वह परम शांति जो सत्य के मार्ग पर चलने से मिलती है, उससे हम हमेशा के लिए वंचित रह जाएंगे।

4 पैसे का भ्रम बनाम सत्य का शाश्वत आनंद।
मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ और मानता हूँ कि भौतिक संसार में जीने के लिए धन की आवश्यकता है। पैसे के बल पर भी मनुष्य को एक प्रकार की ऊर्जा और खुशी मिलती है। बैंक बैलेंस, गाड़ी, बड़ा मकान ये सब मनुष्य को कुछ समय के लिए प्रफुल्लित और आनंदित कर सकते हैं।
लेकिन हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि यह संसार नश्वर है। एक न एक दिन हम सबको इस मृत्यु लोक को छोड़कर जाना ही होगा। जब आप इस मृत्यु लोक के पार जाना चाहते हैं, जब आप उस परमपिता परमात्मा से वास्तव में जुड़ना चाहते हैं, तब सांसारिक धन-दौलत की कोई कीमत नहीं रह जाती।
वहां केवल एक ही सिक्का चलता है, और वह है सत्यता का सिक्का। यदि आप ईश्वर से एकाकार होना चाहते हैं, तो आपको अपने जीवन में सत्यता को अपनाना ही होगा। आपको अपने भीतर सकारात्मक और अच्छी ऊर्जाओं का संचार करना ही होगा। जब तक हम भौतिक सुखों के क्षणिक भ्रम से बाहर नहीं निकलेंगे, तब तक हम उस शाश्वत आनंद को नहीं छू पाएंगे।

निष्कर्ष।
अंतरात्मा की आवाज़ को पहचानें
इस पूरे विचार और वीडियो का एकमात्र उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना या डराना बिल्कुल नहीं है। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि हम सब मिलकर उस सत्यता को उजागर कर सकें जो हमारे भीतर कहीं सो गई है।
परमात्मा दयालु हैं। वे बार-बार किसी सत्य पुरुष के रूप में, किसी घटना के रूप में हमारे सामने आते हैं, लेकिन हम अपने लालच के वश में होकर उन्हें हर बार अनदेखा कर देते हैं। अब समय आ गया है कि हम जागें। यह जानें कि हम अनजाने में कितनी बार ईश्वर को अपने जीवन से दूर कर रहे हैं।
आइए, आज से ही प्रयास करें कि हम अपने कर्मों को शुद्ध बनाएं, प्रकृति से प्यार करें, और लालच के उस जाल को काटें जो हमें परमात्मा से दूर ले जाता है। क्योंकि अंत में, केवल सत्य ही टिकेगा।
जय हो प्रकृति, जय हो परमात्मा, जय हो शक्ति।
(अगर आपको इस वीडियो और लेख में कही गई बातें तार्किक और सही लगी हों, तो इसे अपने तक सीमित न रखें। इसे अधिक से अधिक शेयर करें ताकि हर सोई हुई अंतरात्मा जाग सके। नीचे कमेंट में अपने विचार जरूर साझा करें कि क्या वाकई हम धन के आगे ईश्वर को भूलते जा रहे हैं ?)

चेतावनी एवं स्पष्टीकरण।
इस ब्लॉग पोस्ट (आर्टिकल) में दर्शाए गए दृश्य और संवाद पूर्णतः प्रतीकात्मक हैं। हमारा उद्देश्य किसी भी समुदाय या व्यक्ति की आस्था पर प्रहार करना नहीं है, बल्कि मानव स्वभाव की एक कड़वी सच्चाई को सामने लाना है।
यह ब्लॉग पोस्ट (आर्टिकल) एक दर्पण है जो यह दर्शाता है कि हम ईश्वर को पूजते तो हैं, लेकिन यदि परमात्मा या कोई सत्य पुरुष स्वयं आकर हमें भ्रष्टाचार और लालच का मार्ग छोड़ने को कहे, तो हम उस दिव्य ऊर्जा को ही दुत्कार देते हैं। हमारा प्रयास केवल सत्य और धर्म के मार्ग के प्रति जागरूकता और गहरा आत्म-चिंतन जगाना है।

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