आइए इस पहले अध्याय में समझते हैं कि हमारे चारों ओर का अदृश्य जगत कितना बड़ा है और विज्ञान इस बारे में क्या कहता है।
मानव आँख की सीमाएँ, हम कितने अंधे हैं ?
विज्ञान की भाषा में कहें तो हमारी आँखें केवल दृश्य प्रकाश (Visible Light) को देख सकती हैं। जब वैज्ञानिक पूरे ब्रह्मांड में फैली हुई तरंगों यानी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम (Electromagnetic Spectrum) का अध्ययन करते हैं, तो पता चलता है कि हमारी आँखों की क्षमता इस पूरे स्पेक्ट्रम का सिर्फ 0.0035% ही है!
इसे एक आसान उदाहरण से समझें: मान लीजिए कि ब्रह्मांड की कुल ऊर्जा और तरंगें 1000 किलोमीटर लंबी एक सड़क हैं, तो हमारी आँखें उस सड़क पर केवल एक छोटे से कंकड़ (कुछ मिलीमीटर) के बराबर ही देख पाती हैं। बाकी की पूरी सड़क हमारे लिए पूरी तरह अदृश्य है।
आपके कमरे में इस वक्त हज़ारों तरह के रंग, प्रकाश और तरंगें तैर रही हैं, लेकिन आपका शरीर और आँखें उन्हें पकड़ने के लिए नहीं बनी हैं। इसलिए हमें लगता है कि कमरा खाली है, जबकि वह सूचनाओं के एक बहुत बड़े महासागर से भरा हुआ है।
क्या जो नहीं दिखता, वह अस्तित्व में नहीं है ?
हवा हमें दिखाई नहीं देती, लेकिन इसके बिना हम दो मिनट भी ज़िंदा नहीं रह सकते। गुरुत्वाकर्षण (Gravity) दिखाई नहीं देता, लेकिन इसी के कारण पृथ्वी सूर्य के चक्कर लगा रही है और हम ज़मीन पर टिके हुए हैं।
ठीक इसी तरह, सैटेलाइट से आने वाले सिग्नल, आपके मोबाइल का वाई-फाई, और रेडियो की तरंगें आपके आस-पास हर सेकंड मौजूद हैं। वे रात-दिन आपके शरीर के आर-पार गुज़र रही हैं। भले ही वे हमें दिखाई नहीं देतीं, लेकिन उनका अस्तित्व सौ प्रतिशत सच है। ठीक यही बात इंसानी ऊर्जा और विचारों पर भी लागू होती है।
विज्ञान और अदृश्य शक्तियों का संबंध।
जैसे-जैसे विज्ञान आगे बढ़ रहा है, वह प्राचीन आध्यात्मिक बातों को साबित कर रहा है। क्वांटम मैकेनिक्स (Quantum Mechanics) के आने के बाद वैज्ञानिकों ने माना कि इस संसार में कोई भी चीज़ ठोस नहीं है। अगर आप एक पत्थर को या अपने हाथ को भी किसी महा-माइक्रोस्कोप के नीचे देखेंगे, तो पाएंगे कि उसके अंदर केवल परमाणु (Atoms) हैं जो बहुत तेज़ी से कांप (Vibrate) रहे हैं।
यानी, जो हमें ठोस दिखाई दे रहा है, वह असल में शुद्ध ऊर्जा (Pure Energy) है जो एक खास गति से हिल रही है। जब यह ऊर्जा धीमी होती है, तो ठोस दिखाई देती है, और जब यह बहुत तेज़ होती है, तो अदृश्य तरंग बन जाती है।
निष्कर्ष।
इस अध्याय की बड़ी सीख
अदृश्य जगत की शुरुआत हमें यह सिखाती है कि हम अपनी सीमित आँखों से इस असीमित ब्रह्मांड को पूरी तरह नहीं नाप सकते। जो तरंगें रेडियो और टीवी चला रही हैं, वे सिर्फ एक शुरुआत हैं। जब हम गहरे उतरेंगे, तो पाएंगे कि हमारे विचार, हमारी भावनाएं और हमारी आत्मा भी इसी अदृश्य ऊर्जा नेटवर्क का एक हिस्सा हैं।
अगले अध्याय में हम जानेंगे कि ये रेडियो और सैटेलाइट तरंगें अंतरिक्ष में कैसे काम करती हैं और वे इंसानी दिमाग से कैसे मेल खाती हैं।
अस्वीकरण (Disclaimer)।
इस लेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत अध्ययन, दार्शनिक दृष्टिकोण और विभिन्न स्रोतों पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी भी जाति, धर्म, संप्रदाय या व्यक्तिगत मान्यताओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। विज्ञान और अध्यात्म के इस विश्लेषण को केवल ज्ञान और वैचारिक विमर्श के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।

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