लाइफ का मनोविज्ञान, दिखावे की दौड़ में कर्ज का नया जाल ।

आज हम एक ऐसे विषय पर दिल खोलकर बात करने वाले हैं, जो हमारे समाज के एक बहुत बड़े हिस्से की अंदरूनी हकीकत है । यह कहानी है हमारे उन भाइयों की, जो अपनी मिट्टी, अपना परिवार और अपनों का साथ छोड़कर सात समंदर पार जाते हैं । मकसद सीधा और साफ होता है। परिवार को एक अच्छी जिंदगी देना, सिर से कर्ज का बोझ उतारना और दो पैसे बचाना ।


शुरुआत में सब कुछ ठीक चलता है । दिन-रात की हाड़-तोड़ मेहनत रंग लाती है, काम जम जाता है, और हाथ में थोड़े पैसे आने लगते हैं । यहाँ तक तो कहानी किसी सपने जैसी सुंदर लगती है । लेकिन असली मोड़ तब आता है, जब परदेस से कमाकर इंसान कुछ दिनों के लिए अपने गांव या शहर लौटता है ।

1 दिखावे की अंधी दौड़ और अनियोजित खर्च ।
जब पैर अपनी जमीन पर पड़ते हैं, तो सालों का दबा हुआ अकेलापन और संघर्ष एक अलग रूप ले लेता है । समाज में सफल दिखने की चाह में, इंसान पानी की तरह पैसा बहाना शुरू कर देता है ।

एक हाथ से कर्ज उतरा, दूसरे हाथ से नया कर्ज । 
जो पैसे भविष्य की सुरक्षा के लिए बचने चाहिए थे, वे चंद दिनों की वाह-वाही में खर्च हो जाते हैं । नतीजा- कुछ ही समय में इंसान फिर से उसी कर्ज के जाल में फंस जाता है, जिससे निकलने के लिए उसने परदेस का रुख किया था ।

इसके पीछे का मनोविज्ञान ।
क्यों होता है देखा-देखी का यह शिकार ?
अगर हम तार्किक और मनोवैज्ञानिक रूप से सोचें, तो कोई भी व्यक्ति जानबूझकर अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मारना चाहता । फिर भी लोग इस जाल में फंस जाते हैं । इसके पीछे कुछ मुख्य मानसिक कारण हैं ।

कुछ छूट जाने का डर (FOMO - Failure of Being Left Behind) ।
जब परदेस कमाने गया व्यक्ति देखता है कि उसके साथ का या पड़ोस का कोई दूसरा व्यक्ति विदेश से लौटकर चार मंजिला मकान खड़ा कर रहा है, तो उसके भीतर एक हीन भावना (Inferiority Complex) जागने लगती है । उसे लगता है कि अगर मैंने ऐसा नहीं किया, तो समाज सोचेगा कि मैं विदेश में नाकाम रहा या मैंने कुछ नहीं कमाया ।

पहचान का संकट (Identity Crisis) ।
परदेस में हमारे भाई बहुत ही साधारण, कभी-कभी बेहद कठिन और अकेलेपन की जिंदगी जीते हैं । वहां कोई उन्हें नहीं जानता । इस अकेलेपन और गुमनामी के बदले, वे जब अपने वतन लौटते हैं, तो एक ही झटके में खास और सफल दिखना चाहते हैं । बड़ा मकान और महंगी चीजें दरअसल उनके उसी दबे हुए स्वाभिमान को संतुष्ट करने का एक जरिया बन जाती हैं ।

तर्क पर हावी होती भावनाएं ।
मनोवैज्ञानिक रूप से, जब इंसान लंबे समय तक परिवार से दूर रहता है, तो उसके अंदर एक अपराध बोध (Guilt) होता है कि वह अपने बच्चों और परिवार को वक्त नहीं दे पा रहा । इस गिल्ट को मिटाने के लिए वह तार्किक रूप से सोचना बंद कर देता है और भावुक होकर परिवार की हर जायज-नाजायज मांग और समाज की देखा-देखी में पैसा लुटाने लगता है ।

2 ईंट-पत्थर का महल या गले की फांस ?
इस पूरी कहानी का सबसे भावुक और विचारणीय पहलू है घर बनाना । हर परदेसी का सपना होता है कि उसका अपना एक पक्का और सुंदर घर हो । सपना देखना गलत नहीं है, लेकिन समस्या तब होती है जब यह सपना जरूरत से बढ़कर हैसियत के प्रदर्शन का जरिया बन जाता है ।
लोग विदेशों में खून-पसीना बहाकर इतना बड़ा आलीशान मकान खड़ा कर लेते हैं, जिसकी शायद उनके छोटे से परिवार को जरूरत भी नहीं होती ।

सफाई और रखरखाव की आफत ।
घर इतना बड़ा हो जाता है कि बाद में उसकी साफ-सफाई और देखरेख करना अकेले दम पर मुमकिन नहीं होता ।

लक्जरी का भारी बोझ ।
घर के अंदर ऐसी महंगी और आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक चीजें, झूमर, और एयर कंडीशनर लगा दिए जाते हैं, जिनका बिजली बिल बाद में आमदनी पर भारी पड़ने लगता है ।
सोचने वाली बात यह है, जब तक विदेशी मुद्रा (Forex) आ रही है, तब तक तो यह ठाट-बाठ बहुत अच्छे लगते हैं । लेकिन क्या हमने कभी अगर और मगर के बारे में सोचा है ?

अगर नौकरी चली गई तो क्या ? एक अनकहा डर।
जीवन अनिश्चितताओं से भरा है । वैश्विक मंदी, वीजा के नियम, कंपनी का बंद होना या सेहत का साथ न देना, वजह कुछ भी हो सकती है । भगवान न करे, लेकिन अगर किसी भी वजह से विदेश की वह नौकरी चली जाए, तो क्या होता है ?
तब पीछे छूट जाता है, एक बहुत बड़ा खाली मकान, भारी-भरकम बिजली के बिल, समाज की उम्मीदें और फिर से सिर उठाए खड़ा वो कर्ज । उस वक्त परदेस से लौटा इंसान अपने ही बनाए उस आलीशान घर में घुटने को मजबूर हो जाता है । जो घर सुकून देने के लिए बना था, वही सबसे बड़ा तनाव बन जाता है ।

3 लोग ऐसा क्यों करते हैं ? 
इसके पीछे एक गहरा मानसिक डर और सामाजिक दबाव होता है ।

तार्किक सोच की कमी ।
ईंट-पत्थर बनाम मानसिक शांति
यदि हम ठंडे दिमाग से और तर्क के साथ सोचें, तो एक मकान का काम आपको छत और सुरक्षा देना है, समाज में आपकी रैंकिंग तय करना नहीं ।
लोग यह भूल जाते हैं कि समाज की याददाश्त बहुत छोटी होती है । आप कितना ही बड़ा घर बना लें, लोग दो दिन तारीफ करेंगे और भूल जाएंगे ।
लेकिन उस घर को मेंटेन करने का तनाव, लोन की किस्तें और बिजली के भारी-भरकम बिल का भुगतान केवल और केवल आपको करना है, उस पड़ोस या समाज को नहीं जिसकी देखा-देखी आपने यह कदम उठाया था ।

4 मानवता के नाते एक अपील, संतुलन ही जीवन है ।
यह पोस्ट किसी की आलोचना करने के लिए नहीं है, बल्कि यह हमारे परदेसी भाइयों के प्रति एक गहरी संवेदना और चिंता है । आप परदेस में जो कमा रहे हैं, वह आपकी मेहनत की गाढ़ी कमाई है । उसका सम्मान कीजिए ।

दिखावे से बचें ।
समाज को आपकी बड़ी गाड़ी या बड़े मकान से कोई सरोकार नहीं है । वक्त आने पर आपकी बचत ही आपका साथ देगी ।

जरूरत के हिसाब से घर बनाएं ।
घर उतना ही बड़ा बनाएं जिसे आप और आपका परिवार हंसते-खेलते संभाल सके । घर बड़ा होने से नहीं, उसमें रहने वाले लोगों के खुश रहने से घर बनता है ।

भविष्य के लिए निवेश करें ।
पैसे को ईंट-पत्थर में लॉक करने के बजाय ऐसी जगह निवेश करें, जो कल को नौकरी न रहने पर भी आपको नियमित आमदनी (Passive Income) दे सके ।

आखिरी बात ।
परदेस का संघर्ष बहुत बड़ा होता है । अपनों के जन्मदिन, त्योहार और सुख-दुख छोड़कर जो पैसा कमाया गया है, उसे चंद दिनों के दिखावे में मत उड़ाइए । अपनी चादर देखकर पैर पसारना ही सच्ची समझदारी है । ताकि जब आप हमेशा के लिए अपनी मिट्टी में लौटें, तो आपके सिर पर कर्ज का बोझ नहीं, बल्कि सुकून की नींद हो ।


महत्वपूर्ण नोट (Disclaimer)।
लेखक के दिल से । 
इस पोस्ट का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति की भावनाओं, उनकी मेहनत, या उनके सपनों को ठेस पहुंचाना या उनकी आलोचना करना बिल्कुल नहीं है । हम हमारे उन सभी भाई-बहनों का दिल से सम्मान करते हैं जो अपने परिवार के सुंदर भविष्य के लिए अपनी मातृभूमि से दूर रहकर दिन-रात खून-पसीना बहाते हैं । उनका यह त्याग वंदनीय है ।

यहाँ व्यक्त किए गए विचार पूरी तरह से एक सकारात्मक और तार्किक दृष्टिकोण पर आधारित हैं, जिसका एकमात्र मकसद समाज में जागरूकता लाना और हमारे परदेसी भाइयों को वित्तीय रूप से सुरक्षित देखना है । हम चाहते हैं कि आपकी मेहनत की गाढ़ी कमाई सुरक्षित रहे, ताकि आपका आने वाला कल मानसिक शांति और खुशियों से भरा हो । यदि जाने-अनजाने इस लेख से किसी की भावनाओं को ठेस पहुँची हो, तो हम उसके लिए क्षमाप्रार्थी हैं ।


आपके इस बारे में क्या विचार हैं ? क्या आपने भी अपने आसपास ऐसा होते देखा है ? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें ।
अगर आपको यह पोस्ट दिल को छूने वाली और उपयोगी लगी हो, तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें जो विदेशों में रह रहे हैं, धन्यवाद ।

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