जब माता-पिता बूढ़े होने लगें, अधिकार से स्वीकार तक का सफर।

बचपन में माता-पिता का हम पर अधिकार होता है, लेकिन बुढ़ापे में उन्हें हमारे स्वीकार की जरूरत होती है । जानिए माता-पिता की सच्ची सेवा और इस खूबसूरत रिश्ते का असली मर्म, जो हर संतान को जरूर समझना चाहिए ।


अधिकार और स्वीकार (The Reality of Love & Responsibility) ।
अक्सर हमारे समाज में एक बहुत ही अजीब विरोधाभास देखने को मिलता है । एक स्त्री जब किसी घर में पत्नी बनकर आती है, तो वह अपने पति को बेतहाशा चाहती है । वह चाहती है कि उसका पति सिर्फ उसकी सुने, उसकी बुद्धिमत्ता का सम्मान करे, और यहाँ तक कि उसके अनुसार ही अपनी जिंदगी के फैसले ले । यहाँ तक तो बात फिर भी समझ आती है, यह एक स्त्री का अपने पुरुष पर हक और अधिकार का भाव है ।

लेकिन असली परीक्षा तब होती है, जब अधिकार के साथ स्वीकार की बारी आती है ।
आप उस पुरुष के सर्वश्रेठ रूप (Best Version) से तो प्यार करती हैं, जो आज कमा रहा है, सँवर कर आपके सामने खड़ा है । लेकिन क्या आप उसके उस अतीत और उस जड़ (Roots) को स्वीकार कर पाती हैं, जिससे मिलकर वह आज एक इंसान बना है ?

1 जड़ को झुठलाकर पत्तियाँ हरी नहीं रह सकतीं ।
जब हम किसी से जुड़ते हैं, तो हम केवल एक व्यक्ति से नहीं, बल्कि उसके पूरे वजूद से जुड़ते हैं । जिस पति पर आज आप अपना पूरा प्रभाव जमाना चाहती हैं ।
कभी उसके माता-पिता और दादा-दादी ने उसके बचपन की हर गंदगी (लार, नाक, और मल-मूत्र) को बिना किसी घृणा के, चेहरे पर मुस्कान लिए साफ किया था ।

आज वही बुजुर्ग अगर बुढ़ापे या बीमारी के कारण उसी स्थिति में पहुँच गए हैं, जहाँ उनके मुँह से लार टपकती है, नाक से पानी आता है, या वो अपनी शारीरिक क्रियाओं पर नियंत्रण खो चुके हैं... तो वहाँ घृणा कैसी ?

यदि एक पत्नी पति को अपना सब कुछ मानती है, लेकिन उसके माता-पिता की इस लाचारी को देखकर मुँह सिकोड़ती है या उसे बोझ समझती है, तो वहीं से घर में अशांति का जन्म होता है । आप किसी के तने (पति) को तो अपना बनाना चाहती हैं, लेकिन उसकी जड़ों (माता-पिता) को काट देना चाहती हैं, ऐसा पेड़ कभी फल नहीं दे सकता ।

मेरा दिमाग तुमसे ज्यादा चलता है । यह अहंकार है, समर्पण नहीं ।
प्यार वश में करने का नाम नहीं, बल्कि अंश बन जाने का नाम है ।
मनोविज्ञान कहता है कि जब कोई साथी रिश्ते में, मैं तुमसे ज्यादा समझदार हूँ या तुम्हें मेरी ही बात माननी होगी का रवैया अपनाने लगता है, तो वह रिश्ता प्रेम का नहीं, सत्ता (Power Struggle) का खेल बन जाता है ।

सच्ची समझदारी सामने वाले को नीचा दिखाने में नहीं, बल्कि उसके उस परिवार को संभालने में है जिसने उसे पाल-पोसकर इस काबिल बनाया कि आज वह आपका जीवनसाथी है ।

2 दिल को छूने वाली एक कड़वी सच्चाई (Conclusion) ।
बचपन में माँ-बाप ने बेटे की गंदगी साफ की क्योंकि वो उससे प्यार करते थे । आज बुढ़ापे में अगर उस बेटे और उसकी पत्नी को माता-पिता की सेवा का मौका मिला है, तो यह घृणा का विषय नहीं, बल्कि सौभाग्य है ।
घर में शांति का सीधा नियम है । पति के दिल पर राज करने का रास्ता उसे उसके परिवार से दूर करके नहीं, बल्कि उसके परिवार को अपना बनाकर तय होता है ।

3 अधिकार और स्वीकार, माता-पिता की सेवा का असली मर्म ।
बचपन में माता-पिता का हम पर पूरा अधिकार होता है । वे हमें उंगली पकड़कर चलना सिखाते हैं, हमारे हर फैसले में शामिल होते हैं । लेकिन जैसे-जैसे वे बुजुर्ग होते जाते हैं, वक्त का पहिया घूम जाता है ।
बुढ़ापे में माता-पिता को हमारे किसी अधिकार की नहीं, बल्कि हमारे स्वीकार की जरूरत होती है ।

अधिकार से स्वीकार का सफर । 
जब माता-पिता बूढ़े होने लगें, तो उन पर अपना अधिकार जताने के बजाय, उनकी कमजोरियों को स्वीकार करना ही सच्ची सेवा है । उनके बार-बार भूलने को स्वीकार करना, उनके धीमे चलने को स्वीकार करना, और उनके बदलते स्वभाव को बिना चिढ़े अपनाना ही वास्तविक सेवा है ।

सेवा सिर्फ कर्तव्य नहीं, माता-पिता की सेवा कोई एहसान या सिर्फ एक कानूनी कर्तव्य नहीं है । यह उस निस्वार्थ प्रेम का प्रतिफल है जो उन्होंने हमें तब दिया था जब हम पूरी तरह उन पर निर्भर थे ।

जिन्होंने हमारे कल के लिए अपना आज त्याग दिया, उनके आज को संभालना ही हमारा सबसे बड़ा धर्म है ।
आइए, अपने माता-पिता को केवल अपना समय न दें, बल्कि उन्हें उनके आत्मसम्मान के साथ स्वीकार करें । क्योंकि सेवा का असली आनंद अधिकार जताने में नहीं, बल्कि स्वीकार करने में है ।

4 अधिकार और स्वीकार, माता-पिता की सेवा की गहराई ।
हमारे जीवन में दो शब्द बहुत मायने रखते हैं, अधिकार (Right) और स्वीकार (Acceptance)। जब इन दो शब्दों को हम माता-पिता और बच्चों के रिश्ते के तराजू पर तौलते हैं, तो हमें जीवन का सबसे बड़ा दर्शन समझ में आता है ।

बचपन का अधिकार।
जब हम छोटे होते हैं, तो माता-पिता का हम पर पूरा अधिकार होता है । वे हमारी सुरक्षा तय करते हैं, हमारे लिए सही-गलत का फैसला लेते हैं । हम भी उन पर अपना पूरा अधिकार समझते हैं । रोकर, जिद करके अपनी हर बात मनवाते हैं । यह अधिकार के धागे से बंधा एक खूबसूरत दौर होता है ।

बुढ़ापे का स्वीकार।
समय बदलता है, हम बड़े हो जाते हैं और माता-पिता बुजुर्ग । इस मोड़ पर आकर रिश्ते की परिभाषा बदल जानी चाहिए । अब माता-पिता को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि वे हम पर आश्रित हैं । यहाँ अधिकार की जगह स्वीकार ले लेता है ।

कमजोरियों को स्वीकार करना ।
उम्र के साथ उनका शरीर थकेगा, याददाश्त कमजोर होगी, शायद वे एक ही बात को चार बार दोहराएं । सच्ची सेवा यह है कि हम उनके इस रूप को बिना किसी खीझ या चिड़चिड़ाहट के सहर्ष स्वीकार करें ।

उनके फैसलों को स्वीकार करना ।
कई बार बड़े होने के बाद हम माता-पिता को टोकने लगते हैं, उन पर अपना अधिकार चलाने लगते हैं कि आपको यह नहीं पता, आप चुप रहिए । यह उनकी सेवा नहीं, उनका अपमान है । उनकी राय को सम्मान देना और उन्हें घर का मुखिया बनाए रखना ही मानसिक सेवा है ।


5 सेवा का असली स्वरूप क्या है ?
माता-पिता की सेवा केवल उन्हें अच्छा भोजन, दवाइयाँ या ऐशो-आराम के साधन दे देना नहीं है ।

वक्त देना ।
उनके पास बैठना, उनकी पुरानी कहानियों को फिर से सुनना जैसे आप पहली बार सुन रहे हों ।

भावनात्मक सुरक्षा ।
उन्हें यह एहसास दिलाना कि वे आज भी इस घर की नींव हैं, कोई बोझ नहीं ।

आइए, वश में करने की जिद को छोड़ें और विश्वास का दामन थामें । क्योंकि रूप और जवानी तो ढल जाएगी, लेकिन जो सेवा और सम्मान आप आज बुजुर्गों को देंगी, वही कल आपकी संतान से आपको वापस मिलेगा । 

निष्कर्ष
माता-पिता ने हमें तब स्वीकार किया था जब हम बोलना, चलना और यहाँ तक कि खाना भी नहीं जानते थे । आज जब वे जीवन के उस पड़ाव पर हैं जहाँ उन्हें हमारी जरूरत है, तो उन पर हुक्म चलाने का अधिकार छोड़ने और उन्हें पूरे दिल से स्वीकार करने का नाम ही सच्ची सेवा है ।

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