मन की शक्ति और हमारे कर्म, क्या है इंसान की असली हकीकत ?

हम मन ही मन पता नहीं क्या-क्या बना लेते हैं और क्या-क्या मिटा लेते हैं। हमारी सोच की यह दुनिया जितनी अदृश्य है, उतनी ही शक्तिशाली भी है। आज की इस विशेष पोस्ट में हम बात करेंगे इंसान की मानसिकता, सात्विक कर्म और जीवन की उस हकीकत के बारे में, जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं।
इस पोस्ट को अंत तक जरूर पढ़ें, ताकि आप समझ सकें कि हमारी सोच और हमारे कर्म मिलकर हमारे भाग्य को कैसे तय करते हैं।
                   

1 मानसिक सोच का खेल, बुरा सोचने से बचें।
हम मानसिक रूप से बहुत कुछ करते हैं। हम मन ही मन पूजा करते हैं, योजनाएं बनाते हैं, लेकिन कई बार अनजाने में हम मानसिक रूप से किसी को दुख पहुंचाने या उसका अहित करने के बारे में भी सोच बैठते हैं।

० एक विचारणीय बात:- जब हम मन में किसी का बुरा सोच सकते हैं, तो क्यों न मानसिक रूप से किसी का भला सोचें ? क्यों न मन ही मन किसी को दान देने और निस्वार्थ भाव से मदद करने का संकल्प लें ?
आजकल बहुत से लोग दान-पुण्य करते तो हैं, लेकिन उसके पीछे उनका कोई न कोई निजी स्वार्थ छिपा होता है। हमें इस मानसिकता को बदलने की जरूरत है।

2 निस्वार्थ दान और कर्मफल का सिद्धांत।
यदि आप समर्थवान हैं, तो हमेशा अपने से छोटे और कमजोर लोगों की दिल से सहायता करें। किसी जरूरतमंद को रहने के लिए जगह, जमीन या उसके परिवार की बुनियादी जरूरत की चीजें दान करना सबसे बड़ा पुण्य है।

विशेष नोट:- दान हमेशा पात्र और जरूरतमंद को ही करना चाहिए। समर्थवान (जो खुद सक्षम हैं) को दान करने का कोई औचित्य नहीं होता।

० कर भला तो हो भला:- कर्म का सिद्धांत अटल है। हम जैसे कर्म बोते हैं, वैसी ही फसल काटते हैं। अनजाने में किए गए गलत कर्म आगे चलकर हमारी जिंदगी में कांटों की तरह चुभते हैं। इसलिए हमेशा सात्विक मानसिक सोच रखें और सात्विक कर्म करते रहें।

3 भगवान से मांगना छोड़ें, कर्मों को सुधारें।
ईश्वर, अल्लाह या परमेश्वर ने जब हमें इस दुनिया में भेजा, तो सब कुछ देकर भेजा था। लेकिन हमारे गलत कर्मों और नकारात्मक सोच ने उन सभी आशीर्वादों को दबा दिया।
भगवान से हर वक्त केवल मांगते रहने के बजाय, उनकी आराधना करें ताकि हमें सही ज्ञान और सद्बुद्धि मिले। जब हम पैदा होते हैं, तो हमारे भीतर कई दैवीय शक्तियां और सकारात्मक ऊर्जाएं होती हैं। आपने भी कभी न कभी महसूस किया होगा कि जब आप किसी अदृश्य सकारात्मक शक्ति से जुड़ाव महसूस करते हैं, तो आपके शरीर में एक नई ऊर्जा और परिवार में सफलता का संचार होने लगता है।

हम अपनी शक्तियां कैसे खो देते हैं ?
जैसे-जैसे हम बड़े और समझदार होते हैं, हम सांसारिक मोह-माया और भौतिक चीजों के पीछे भागने लगते हैं। इसी आपाधापी में हम अपनी आंतरिक शक्तियों को नष्ट कर देते हैं और फिर भगवान के सामने केवल अपनी इच्छाओं की झोली फैलाकर खड़े हो जाते हैं।

4 जीवन की अंतिम हकीकत क्या है ?
हकीकत बहुत ही सीधी और साफ है, जो इस संसार में बना है, उसे एक दिन नष्ट होना ही है।
हम अपनी आंखों के सामने अपने बड़े-बुजुर्गों को जाते हुए देखते हैं, फिर भी हमें अपनी मृत्यु का अहसास नहीं होता। हम ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे हमें यहाँ हमेशा रहना है। लेकिन सच यही है कि जो उनके साथ हुआ, वह एक दिन हमारे साथ भी होना है। इस सच को स्वीकार करने से मन का अहंकार शांत होता है।

निष्कर्ष।
पशुओं की तरह नहीं, इंसान की तरह जिएं
हम इंसान हैं, इसलिए हमें पशुओं की तरह केवल शारीरिक आवश्यकताओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। हमारा लक्ष्य अपने जीवन को सार्थक बनाना है।
ईश्वर की आराधना करें, सात्विक सोच रखें और लगातार अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहें। जब आप सही कर्म करेंगे, तो आपकी सफलता आपके अपने हाथों में होगी, किसी और के नियंत्रण में नहीं।

आपके विचार हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं।
लेखक: ओमप्रकाश शर्मा
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