प्रकृति क्या है ? समझने की कोशिश करें।

लेखक: ओमप्रकाश शर्मा
प्रिय पाठकों,
आज हम एक ऐसे विषय पर बात करने जा रहे हैं जो हमारे अस्तित्व, हमारे भविष्य और हमारी आने वाली पीढ़ियों से सीधे जुड़ा हुआ है। वर्ष 2020 में जब दुनिया ने कोरोना वायरस और फिर चीन के यूनान प्रांत में हंता वायरस जैसे संकटों को देखा, तब मानवता को एक नया नजरिया मिला। यह लेख उसी नजरिए और आत्म-मंथन का परिणाम है।

प्रकृति और मानवीय कर्मों के गहरे अंतर्संबंध पर आधारित लेखक ओमप्रकाश शर्मा का एक अत्यंत विचारोत्तेजक लेख। इस पोस्ट में वर्ष 2020 के वैश्विक संकटों, जैसे कोरोना और हंता वायरस के संदर्भ में, प्रकृति के ऊर्जा सिद्धांत और संतुलन के नियम की दार्शनिक व्याख्या की गई है। लेख यह समझने में मदद करता है कि कैसे मानवीय भूलें और मांसाहार जैसी प्रवृत्तियां सृष्टि के नियमों के खिलाफ जाती हैं और महामारियों को आमंत्रित करती हैं। सात्त्विक जीवन, करुणा और प्रकृति संरक्षण के महत्व को जानने के लिए इस पोस्ट को पूरा पढ़ें, अपने विचार बदलें और मानवता की रक्षा के इस सफर में जुड़ें।

आपसे अनुरोध है कि इस पोस्ट को पूरा और ठंडे दिमाग से पढ़ें। यदि विचार सही लगें तो इन्हें अपने जीवन में उतारें, और यदि असहमत हों तो इसे एक दृष्टिकोण समझकर छोड़ दें। हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि एक कड़वे सच से रू-ब-रू कराना है।


1 प्रकृति क्या है ? और हमारा कर्तव्य क्या है ?
प्रकृति का अर्थ है वह सब कुछ जो इस ब्रह्मांड में स्वाभाविक रूप से मौजूद है, जिसे मनुष्यों ने नहीं बनाया। ये नदियाँ, गगनचुंबी पहाड़, घने जंगल, पशु-पक्षी, हवा, पानी और वे सभी भौतिक प्रक्रियाएँ जो जीवन को संभव बनाती हैं, यही प्रकृति है। यह पूरा ब्रह्मांड एक अंतर्निहित व्यवस्था से चलता है।

एक विचारणीय सत्य।
इस सृष्टि में हम इंसान मालिक नहीं, बल्कि सिर्फ मेहमान हैं। यह दुनिया एक किराए के मकान की तरह है। यदि हम इस मकान (सृष्टि) के नियमों का पालन करेंगे, तो यह प्रकृति एक माँ (देवी) की तरह हमारा पालन-पोषण करेगी। लेकिन यदि हम इसके साथ खिलवाड़ करेंगे, तो हमें इसकी भारी कीमत चुकानी ही पड़ेगी।

2 ऊर्जा का सिद्धांत, जैसा बोओगे, वैसा काटोगे
अक्सर आपने ध्यान दिया होगा कि जब कोई शक्तिशाली व्यक्ति किसी कमजोर या छोटे को डराता है या डांटता है, तो उसे एक अजीब सा, झूठा आनंद मिलता है। आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो जब आप किसी जीव को भयभीत करते हैं, तो उसकी नकारात्मक ऊर्जा और पीड़ा आपके भीतर समाहित हो जाती है।
ठीक इसी तरह, जब हम अमूक जानवरों पर अत्याचार करते हैं, उन्हें अपने फायदे के लिए तड़पाते हैं या मारते हैं, तो उनकी वह चीख और नकारात्मक ऊर्जा हमारे समाज में फैलती है। यही प्रकृति का ऊर्जा सिद्धांत है।

कर्मों का चक्र और प्रकृति का संतुलन।
० बीज का नियम:- यदि आप मिट्टी में एक या दो बार खराब बीज बोएंगे, तो शायद वह नष्ट हो जाएगा। लेकिन यदि आप बार-बार खराब बीज ही बोते रहेंगे, तो एक दिन पूरी फसल ही जहरीली हो जाएगी।

० अति का अंत:- इंसान सोचता है कि वह एक-दो बार बुरे कर्म करके बच गया, तो हमेशा बच जाएगा। ऐसा नहीं है। जब पाप या कुकर्मों का घड़ा भर जाता है, तो प्रकृति अपना संतुलन (Balance) खुद बनाती है, जो इंसानों के नियंत्रण से बाहर होता है।


3 वैश्विक संकट, प्रकृति के खिलाफ जाने का परिणाम।
चीन जैसे देशों का उदाहरण हमारे सामने है, जहाँ खान-पान और वन्यजीवों के साथ क्रूरता की सारी हदें पार कर दी गईं। अपनी जीभ के स्वाद में अंधे होकर इंसान हर तरह के जानवर को खा रहा है। किसी जीव की संतान को मारकर खा जाना और फिर प्रकृति से दया की उम्मीद करना, यह कैसे संभव है ?
जब इंसान प्रकृति के नियमों के खिलाफ जाकर चरम सीमा पर पहुँच जाता है, तो प्रकृति महामारियों के रूप में जवाब देती है। कोरोना वायरस और हंता वायरस जैसी बीमारियाँ कोई इत्तेफाक नहीं हैं, बल्कि यह इस बात का संकेत हैं कि हमने सृष्टि की सीमाओं का उल्लंघन किया है। जो लोग कुकर्म करते हैं या प्रकृति के विनाश में शामिल होते हैं, उनका दिमाग अस्थायी रूप से बहुत तेज काम कर सकता है, उन्हें उसमें आनंद भी मिल सकता है, लेकिन उसका अंतिम परिणाम जहर जैसा ही निकलता है। दुःख की बात यह है कि कुछ लोगों की गलतियों की सजा पूरी मानवता को भुगतनी पड़ती है।

4 समाधान की राह, सात्त्विक जीवन और करुणा।
यदि हम इन संकटों से बचना चाहते हैं और अपनी रक्षा करना चाहते हैं, तो हमें वापस प्रकृति की शरण में आना होगा। इसके लिए हमें निम्नलिखित संकल्प लेने होंगे।

० मांसाहार का पूर्ण त्याग:- मानव शरीर की संरचना मांस खाने के लिए नहीं बनी है। हर जीव में प्राण होते हैं। सात्त्विक भोजन अपनाएं, जो शरीर और मन दोनों को शुद्ध रखता है।

० जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम:- सृष्टि के हर छोटे-बड़े जीव से प्यार करें। यह सोचना बंद करें कि हर दिखने वाली चीज इंसान के उपभोग के लिए है।

० स्वच्छता और सजगता:- अपने आसपास साफ-सफाई रखें। शारीरिक स्वच्छता के साथ-साथ मानसिक विचारों को भी शुद्ध रखें।

० परमात्मा से प्रार्थना:- उस अदृश्य परम शक्ति से अपने अनजाने में किए गए पापों की क्षमा मांगें। प्रार्थना करें कि वह हमें सद्बुद्धि दे ताकि हम सृष्टि की रक्षा कर सकें, जिससे हमारी खुद की रक्षा हो सके।

निष्कर्ष।
यह पोस्ट किसी देश, जाति, धर्म या व्यक्ति विशेष को ठेस पहुँचाने के लिए नहीं लिखी गई है। यह एक वैश्विक सच्चाई है जिसे हम 2020 से लगातार देख रहे हैं। यदि हमारी बातें आपको कड़वी या बुरी लगी हों, तो हम हाथ जोड़कर आपसे क्षमा चाहते हैं। हमारा एकमात्र मकसद आपको सृष्टि के नियमों के प्रति जागरूक करना था।
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प्रकृति की रक्षा करें, प्रकृति आपकी रक्षा करेगी, धन्यवाद।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) 
यह पोस्ट पूरी तरह से लेखक के व्यक्तिगत विचारों, आध्यात्मिक अवलोकनों और दार्शनिक दृष्टिकोण पर आधारित है। वैज्ञानिक रूप से वायरस और महामारियों के फैलने के अलग कारण हो सकते हैं, यह लेख केवल प्रकृति और मानवीय व्यवहार के बीच के एक नैतिक संबंध को दर्शाता है। हम किसी भी अंधविश्वास या भेदभावपूर्ण विचारधारा का समर्थन नहीं करते हैं।

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