प्रकृति का नियम, जब सर्वशक्तिमान ईश्वर भी नहीं तोड़ते सृष्टि के कानून।

मानव इतिहास और विभिन्न सभ्यताओं के अध्ययन में एक प्रश्न हमेशा कौतूहल का विषय रहा है, यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान हैं, तो उन्हें इस धरातल पर अवतार लेने की क्या आवश्यकता पड़ती है ? सनातन धर्म के ग्रंथों और दर्शनशास्त्रों में भगवान के श्रीराम, श्रीकृष्ण, श्रीनृसिंह आदि अनेक अवतारों का वर्णन मिलता है। जब भी अधर्म बढ़ता है या भक्तों की रक्षा करनी होती है, ईश्वर अवतार लेते हैं और दुष्टों का संहार करते हैं।


परंतु प्रश्न यह उठता है कि जो परमात्मा केवल एक संकल्प मात्र से पूरी सृष्टि का सृजन और संहार कर सकता है, उसे किसी माता के गर्भ से जन्म लेने, बाल्यावस्था से गुजरने और एक सामान्य मनुष्य की भांति शारीरिक मर्यादाओं का पालन करने की आवश्यकता क्यों महसूस होती है ?
इसका उत्तर प्रकृति के उन अदृश्य नियमों (Invisible Laws of Nature) में छिपा है, जिनका उल्लंघन स्वयं इस ब्रह्मांड के रचयिता भी नहीं करते।

1 सर्वशक्तिमान परमात्मा और प्रकृति के नियम।
सनातन शास्त्रों के अनुसार, परमात्मा सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है। उसकी ऊर्जा सात्विक रूप से संपूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त है। वैज्ञानिक जगत भले ही इसे ऊर्जा या डार्क मैटर (Dark Matter) कहे, परंतु साधक और संत अपनी साधना के बल पर उस परमात्मा की उपस्थिति और ऊर्जा का अनुभव करते हैं।
जब हम प्रकृति की बात करते हैं, तो प्रकृति केवल पेड़-पौधे, नदियां और पर्वत नहीं हैं, प्रकृति का अर्थ है सृष्टि की व्यवस्था (Cosmic Order/ऋत)।

सूर्य का समय पर उगना और ढलना,
ऋतुओं का चक्र,
जन्म, मृत्यु और कर्मफल का सिद्धांत,
ये सभी प्रकृति के स्थापित कानून हैं। परमात्मा स्वयं इस कानून का रचयिता है, और एक कुशल शासक की भांति वह अपने ही बनाए कानूनों का सम्मान करता है। यदि ईश्वर स्वयं इन नियमों को तोड़ने लगे, तो संपूर्ण ब्रह्मांड की व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी।

2 भगवान प्रत्यक्ष हस्तक्षेप क्यों नहीं करते ? (अवतार का रहस्य)।
कई बार मन में यह विचार आता है कि भगवान सीधे आकाशवाणी करके या कोई चमत्कार करके पापियों का अंत क्यों नहीं कर देते ? वे भेष बदलकर या किसी अदृश्य रूप में आकर भी दुष्टों का अंत कर सकते हैं। परंतु ऐसा न करके वे एक बालक के रूप में अवतार क्यों लेते हैं ?

(क) सृष्टि के विधान का सम्मान।
पृथ्वीलोक का नियम यह है कि यहाँ भौतिक शरीर धारण करने वाले जीवों के माध्यम से ही कर्म का सम्पादन होता है। यदि कोई अलौकिक शक्ति बिना भौतिक रूप धारण किए यहाँ की भौतिक व्यवस्था में सीधा हस्तक्षेप करे, तो वह प्रकृति के स्थापित नियमों के विरुद्ध होगा। इसलिए भगवान गर्भ से जन्म लेते हैं, सामान्य मनुष्य की भांति बड़े होते हैं और समाज के सामने एक आदर्श स्थापित करते हैं।

(ख) कर्मफल और मर्यादा की स्थापना।
श्रीराम का जीवन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। भगवान श्रीराम चाहते तो रावण को अपनी एक दृष्टि से भस्म कर सकते थे। परंतु उन्होंने प्रकृति के नियमों, मानवीय सीमाओं और मर्यादाओं के भीतर रहकर रावण का वध किया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि चाहे आप कितने भी शक्तिशाली क्यों न हों, आपको प्रकृति और धर्म के नियमों का पालन करना ही होगा।
 

3 अदृश्य कानून और कर्म का सिद्धांत।
इतिहास और शास्त्रों के अध्ययन से यह बात स्पष्ट होती है कि प्रकृति का अपना एक अदृश्य न्याय तंत्र है।

० कर्म का नियम (Law of Karma):- मनुष्य जो भी कर्म करता है, प्रकृति उसका फल अवश्य लौटाती है। भले ही कोई व्यक्ति मनुष्य के बनाए कानूनों से बच निकले, परंतु प्रकृति के अदृश्य कानून से कोई नहीं बच सकता।

० ऊर्जा का संतुलन:- जहाँ असत्य और अधर्म बढ़ता है, वहाँ प्रकृति स्वतः संतुलन बनाने की प्रक्रिया प्रारंभ कर देती है। ईश्वर का अवतार उसी संतुलन प्रक्रिया (Cosmic Balance) का सर्वोच्च रूप है।

4 आधुनिक विज्ञान, एलियंस (Aliens) और सनातन दृष्टिकोण।
आज के आधुनिक युग में वैज्ञानिक अन्य ग्रहों पर जीवन और एलियंस (Aliens) की उपस्थिति पर शोध कर रहे हैं। कई लोग दावा करते हैं कि एलियंस के पास अत्यधिक उन्नत तकनीक है और वे बहुत शक्तिशाली हैं।
परंतु सनातन दृष्टिकोण और प्रकृति के नियमों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो, यदि ब्रह्मांड में एलियंस या कोई अन्य उन्नत सभ्यता अस्तित्व में है, तो वे भी इसी भौतिक ब्रह्मांड का हिस्सा हैं।
उन्हें भी इस प्रकृति के भौतिक और अदृश्य नियमों के अधीन ही कार्य करना पड़ेगा।
कोई भी तकनीकी प्रगति या अलौकिक शक्ति, सर्वशक्तिमान परमात्मा और उसकी प्रकृति के नियमों से बड़ी नहीं हो सकती। 
जिस प्रकार ईश्वर को भी इस पृथ्वी पर आने के लिए यहाँ के वातावरण और नियमों के अनुसार अवतीर्ण होना पड़ता है, उसी प्रकार कोई भी बाह्य शक्ति प्रकृति के नियमों को पार करके यहाँ सतत रूप से स्थापित नहीं हो सकती।

5 वर्तमान समय और हमारी सीख।
आज के समय में मनुष्य तकनीक और ज्ञान के घमंड में प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करने लगा है। हम पर्यावरण का दोहन कर रहे हैं, नैतिक मूल्यों को भूल रहे हैं और यह सोचने लगे हैं कि हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
परंतु हमें इस सत्य को स्वीकार करना होगा कि  जब सर्वशक्तिमान ईश्वर भी प्रकृति के नियमों का आदर करते हैं, तो हम तुच्छ मनुष्य इन नियमों से ऊपर कैसे हो सकते हैं ?
प्रकृति का अदृश्य दंड महामारी, प्राकृतिक आपदाओं या मानसिक अशांति के रूप में सामने आता ही है। इतिहास गवाह है कि जिसने भी प्रकृति और धर्म के नियमों को चुनौती दी, उसका पतन निश्चित हुआ।

निष्कर्ष (Conclusion)।
भगवान का अवतार लेना और प्रकृति के नियमों के अधीन होकर कार्य करना हमें यह सिखाता है कि अनुशासन और मर्यादा ही जीवन का मूल आधार हैं।
सनातन धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, यह ब्रह्मांड के गूढ़ वैज्ञानिक और आध्यात्मिक नियमों की समझ है। यदि हम अपने जीवन में शांति, सुख और प्रगति चाहते हैं, तो हमें प्रकृति के इन अदृश्य नियमों का सम्मान करना होगा, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना होगा और यह स्वीकार करना होगा कि सृष्टि की व्यवस्था ही सर्वोच्च है।

Post a Comment

0 Comments