मृत्युलोक का शाश्वत सत्य, परमात्मा की शरण और सात्विक कर्मों से आनंदित जीवन का मार्ग ।

​क्या आप इस नश्वर मृत्युलोक में चौबीस घंटे की मानसिक अशांति और तनाव से जूझ रहे हैं ? जानिए संत कबीर के सत्य का मार्ग, सात्विक कर्मों का न्यूरोलॉजिकल प्रभाव (Helper's High) और परमात्मा की पूर्ण शरणागति का वह अचूक आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक उपाय (योजना-Blueprint), जो आपके जीवन को असीम आनंद और अडिग मनोबल से भर देगा ।

इस पृथ्वी को हमारे शास्त्रों में मृत्युलोक कहा गया है। एक ऐसा रंगमंच जहाँ जो आया है, उसे एक न एक दिन अपना किरदार निभाकर जाना ही है । इस नश्वर संसार में हर इंसान भाग रहा है, तनाव में जी रहा है, अंदरूनी डर से जूझ रहा है । लेकिन क्या आपने कभी शांत होकर सोचा है कि इस चौबीस घंटे की मानसिक अशांति की असली वजह क्या है ?

​वजह साफ है हमने अपनी जीवन रूपी नाव की पतवार गलत हाथों में सौंप दी है । हम माया और अस्थाई चीजों के पीछे भाग रहे हैं और उस परम सत्य को भूल चुके हैं जो हमारे भीतर है ।

​अगर आप इस मृत्युलोक में रहते हुए भी एक ऐसा जीवन जीना चाहते हैं जो दुखों से परे हो, जो असीम आनंद से भरा हो, और जहाँ आपका मनोबल कभी न टूटे, तो उसका केवल एक ही अचूक मार्ग है, सात्विक कर्म, अटूट सत्यता और परमात्मा की पूर्ण शरणागति ।

​1 सत्य का मार्ग और अडिग मनोबल, एक मनोवैज्ञानिक सच।

​लोग परमात्मा को ढूंढने के लिए न जाने कहाँ-कहाँ भटकते हैं, लेकिन संत कबीर कह गए हैं कि सांच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप । सत्य कोई साधारण शब्द नहीं है, सत्य स्वयं परमात्मा का स्वरूप है ।

​जब आप अपने जीवन में सत्यता (Honesty) का रास्ता चुनते हैं, चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, तो आप अनजाने में ही ईश्वर की शरण में चले जाते हैं ।

​इसके पीछे का तार्किक मनोविज्ञान क्या है ?

​मनोविज्ञान के अनुसार, जब कोई व्यक्ति झूठ बोलता है या फरेब का सहारा लेता है, तो उसके मस्तिष्क का अमिगडाला (Amygdala - डर और तनाव को नियंत्रित करने वाला हिस्सा) हमेशा एक्टिव रहता है । उसे हर वक्त यह तार्किक डर सताता है कि कहीं उसकी पोल न खुल जाए । यह डर उसके मनोबल को अंदर से खोखला कर देता है ।

​इसके विपरीत, जब आप सत्य की राह पर होते हैं, तो आपके मस्तिष्क में कोई आंतरिक संघर्ष (Internal Conflict) नहीं होता । आपका अवचेतन मन (Subconscious Mind) पूरी तरह शांत और भयमुक्त होता है । यही कारण है कि सत्य के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति का मनोबल हिमालय की तरह अडिग हो जाता है । उसे ब्रह्मांड की कोई भी ताकत झुका नहीं सकती, क्योंकि उसे पता होता है कि उसके सत्य के पीछे स्वयं ब्रह्मांड के रचयिता की शक्ति खड़ी है ।

​2 सात्विक कर्म, मानसिक शांति और न्यूरोलॉजिकल संतुलन का आधार।

​कर्म तीन प्रकार के होते हैं, तामसिक (दूसरों को नुकसान पहुँचाने वाले), राजसिक (केवल खुद के स्वार्थ और अहंकार के लिए किए गए), और सात्विक कर्म (जो नि:स्वार्थ भाव से, दूसरों की सेवा और भलाई के लिए किए जाते हैं) ।

​जब आप किसी भूखे को भोजन कराते हैं, किसी रोते हुए निराश व्यक्ति को हंसाते हैं, या बिना किसी लालच के समाज की सेवा में तत्पर रहते हैं, तो वे आपके सात्विक कर्म बन जाते हैं ।

​सात्विक कर्मों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव ।

​जब हम सात्विक कर्म यानी दूसरों की मदद करते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में ऑक्सीटोसिन (Oxytocin - प्रेम का हार्मोन) और एंडोर्फिन (Endorphin - सुख देने वाला हार्मोन) का स्राव होता है । इसे मनोविज्ञान में हेल्पर्स हाई (Helper's High) कहा जाता है ।

​अच्छे कर्म आपके मस्तिष्क से नकारात्मकता और आत्म-ग्लानि (Guilt) के कीचड़ को पूरी तरह साफ कर देते हैं ।

​ये कर्म आपके भीतर एक ऐसी अभेद्य मानसिक ढाल का निर्माण करते हैं जो विपरीत से विपरीत समय में भी आपकी मानसिक शक्ति को बिखरने नहीं देती । अच्छे कर्म ही हमारे जीवन का वह ठोस आधार हैं, जिस पर सुखद भविष्य की इमारत खड़ी होती है ।

3 परमात्मा की पूर्ण शरणागति (परम आनंद और तनाव-मुक्ति का शिखर) ।

अध्यात्म में जिसे शरणागति या समर्पण कहा गया है, आधुनिक मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस की भाषा में उसे कंट्रोल छोड़ने की कला (The Art of Letting Go) कहा जाता है । मृत्युलोक में हमारी 80% मानसिक अशांति इस जिद से पैदा होती है कि सब कुछ मेरे हिसाब से होना चाहिए ।

शरणागति का न्यूरोलॉजिकल प्रभाव ।

जब एक व्यक्ति खुद को उस परम चेतना (ब्रह्मांडीय शक्ति या ईश्वर) के प्रति समर्पित कर देता है, तो उसका अहंकार (Ego) विसर्जित होने लगता है । मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex), जो लगातार भविष्य की चिंता करने और योजनाएं बनाने के कारण ओवरवर्क करता है, उसे आराम मिलता है ।

भय से मुक्ति- समर्पण का अर्थ अकर्मण्यता (Idleness) नहीं है । इसका अर्थ है, कर्म मेरा कर्तव्य है, लेकिन परिणाम उस परमात्मा की मर्जी है । जब आप परिणाम का बोझ अपने सिर से उतारकर ईश्वर के कंधों पर रख देते हैं, तो असफलता का डर (Fear of Failure) हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है ।

सकारात्मक हार्मोन का प्रवाह- इस मानसिक अवस्था में मस्तिष्क में डोपामाइन और सेरोटोनिन (Happiness Hormones) का स्तर संतुलित होता है, जिससे अवसाद (Depression) और एंग्जायटी के लिए कोई जगह नहीं बचती । शरणागति आपको एक ऐसी गहरी आंतरिक सुरक्षा देती है कि जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी मेरे कल्याण के लिए ही होगा ।

इस मृत्युलोक में आनंदित जीवन कैसे जिएं ? (The Spiritual & Psychological Blueprint) ।

यदि आप अपनी सोई हुई आत्मा को जगाना चाहते हैं और समाज के लिए एक मिसाल बनना चाहते हैं, तो इन तीन व्यावहारिक चरणों को अपने जीवन का नियम बना लीजिए जो मैने ऊपर भी लिखे और आगे भी लिख दिया है।

सत्य से मनोबल, कर्म से शुद्धि, और समर्पण से शांति, यही जीवन का अंतिम सत्य है ।

1 अटूट सत्यता और भयमुक्ति (The Psychology of Truth)।

अक्सर हमारी आधी से ज़्यादा मानसिक ऊर्जा और तनाव इस बात में नष्ट होते हैं कि हम दुनिया के सामने क्या मुखौटा पहनकर जी रहे हैं ।

वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक सच।

 मनोविज्ञान के अनुसार, जब हम झूठ, फरेब या दिखावे का सहारा लेते हैं, तो हमारे मस्तिष्क का अमिगडाला (Amygdala), जो डर और तनाव को नियंत्रित करता है, हमेशा सक्रिय रहता है । हमें हमेशा अपनी पोल खुलने का अनजाना डर सताता रहता है ।

आनंद का मार्ग ।

इसके विपरीत, जब आप सत्य और ईमानदारी का मार्ग चुनते हैं, तो आपके अवचेतन मन (Subconscious Mind) में कोई आंतरिक संघर्ष नहीं होता । सत्य आपके मनोबल को हिमालय की तरह अडिग और भयमुक्त बना देता है ।

2 सात्विक कर्म और निष्काम सेवा (The Law of 'Helper's High')।

इस संसार में दुख की सबसे बड़ी वजह है, अत्यधिक स्वार्थ और केवल राजसिक या तामसिक इच्छाओं के पीछे भागना ।

वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक सच ।

जब हम निस्वार्थ भाव से किसी की मदद करते हैं, किसी निराश व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान लाते हैं, तो हमारे मस्तिष्क में ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) और एंडोर्फिन (Endorphin) जैसे सुख देने वाले हार्मोन्स का स्राव होता है । विज्ञान की भाषा में इसे हेल्पर्स हाई (Helper's High) कहा जाता है ।

आनंद का मार्ग।

अपने कर्मों को सात्विक बनाइए । समाज और प्रकृति को बिना किसी लालच के कुछ वापस देना शुरू करें । जब आप फल की चिंता छोड़कर कर्म की सुंदरता का आनंद लेते हैं, तो जीवन में असीम शांति का प्रवेश होता है ।

3 परमात्मा की पूर्ण शरणागति और साक्षी भाव (The Art of Letting Go) ।

मृत्युलोक में हमारी मानसिक अशांति की सबसे बड़ी वजह यह जिद है कि सब कुछ मेरे नियंत्रण और मेरी इच्छा के अनुसार ही होना चाहिए ।

वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक सच । 

जब हम सब कुछ खुद नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं, तो हमारा प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (Prefrontal Cortex) ओवरवर्क करता है, जिससे एंग्जायटी और डिप्रेशन जनम लेते हैं ।

आनंद का मार्ग ।

अध्यात्म में जिसे शरणागति कहा गया है, उसे आधुनिक मनोविज्ञान में कंट्रोल छोड़ने की कला (The Art of Letting Go) कहते हैं । यह मान लेना कि कर्म करना मेरा अधिकार है, लेकिन परिणाम उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा या ईश्वर के हाथ में है । जब आप जीवन की घटनाओं को एक साक्षी (Observer) की तरह देखना शुरू करते हैं और परिणाम का बोझ ईश्वर को सौंप देते हैं, तो असफलता का डर हमेशा के लिए मिट जाता है ।

उपसंहार- जीवन का अंतिम नियम ।

जब आप सत्य के मार्ग पर चलकर अपने अमिगडाला (Amygdala हमारे मस्तिष्क का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और छोटा सा हिस्सा है । यह बादाम के आकार का होता है, इसीलिए इसका नाम ग्रीक शब्द amygdala से पड़ा है, जिसका मतलब बादाम होता है ।) को शांत करते हैं, सात्विक कर्मों के हेल्पर्स हाई से अपने न्यूरोलॉजिकल संतुलन को बनाए रखते हैं, और अंत में परमात्मा की शरणागति स्वीकार कर मानसिक तनाव को विसर्जित कर देते हैं, तब आप इस नश्वर संसार के बंधनों से मुक्त हो जाते हैं ।

यही वह Spiritual & Psychological Blueprint है जो एक आम इंसान को साधारणता के धरातल से उठाकर समाज के लिए एक जीवंत मिसाल और जागृत आत्मा बना देता है । फिर यह मृत्युलोक आपके लिए दुखों का रंगमंच नहीं, बल्कि आनंद का उत्सव बन जाता है ।

निष्कर्ष

मृत्युलोक का अर्थ दुखों का सागर नहीं है, बल्कि यह एक रंगमंच है । जब आप सत्य से अपने मनोबल को बढ़ाते हैं, सात्विक कर्मों से मन को शुद्ध करते हैं, और समर्पण से भविष्य की चिंताओं को विसर्जित कर देते हैं, तो यह नश्वर संसार आपके लिए तनाव की जगह आनंद का उत्सव बन जाता है ।

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