भगवान कहा है ? सनातन मै देवता अलग-अलग क्यों है ?

लेखक/प्रस्तुतकर्ता:- ओमप्रकाश शर्मा
पढ़ने का समय:- 10-12 मिनट

मन में उठते दो सनातन प्रश्न
मानव सभ्यता के इतिहास में जब से चेतना का विकास हुआ है, तब से दो प्रश्न हमेशा हर इंसान के मन में कौंधते रहे हैं। पहला सवाल क्या सच में भगवान हैं ? अगर हैं, तो वो हमें दिखाई क्यों नहीं देते ? और दूसरा सवाल, जो विशेषकर सनातन परंपरा को लेकर पूछा जाता है यदि ईश्वर एक है, तो सनातन धर्म में इतने सारे अलग-अलग देवी-देवताओं को क्यों माना जाता है ?

आज के इस वैज्ञानिक और तार्किक युग में, हमारी युवा पीढ़ी को इन प्रश्नों के उत्तर केवल अंधविश्वास या ऐसा लिखा है कहकर नहीं दिए जा सकते। हमें इसके पीछे के गहरे दर्शन, प्रकृति के नियमों और व्यावहारिक उदाहरणों को समझना होगा।
आज के इस विशेष लेख में, हम बहुत ही सरल, व्यावहारिक और तार्किक उदाहरणों के माध्यम से इन दोनों रहस्यों से पर्दा उठाएंगे। यदि आप भी इन सवालों के जवाब ढूंढ रहे हैं, तो इस लेख को अंत तक पूरा पढ़ें। यह आपकी सोच और जीवन के प्रति दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल सकता है।


1 सनातन धर्म में अलग-अलग देवी-देवता क्यों हैं ?
जब भी कोई बाहरी व्यक्ति या हमारी ही नई पीढ़ी सनातन धर्म को देखती है, तो वह भ्रमित हो जाती है कि यहाँ कोई शिव की पूजा कर रहा है, कोई विष्णु की, कोई शक्ति की, तो कोई हनुमान जी की। लोग पूछते हैं कि जब परमेश्वर एक है, तो इतने रूप क्यों ?
इसे समझने के लिए हमें शास्त्रों के गूढ़ रहस्य में जाने की बजाय अपने आस-पास बिखरी प्रकृति को देखना होगा। आइए इसे दो बहुत ही सुंदर और व्यावहारिक उदाहरणों से समझते हैं।

1 हवा का उदाहरण, तत्व एक, रूप अनेक।
हम सब जानते हैं कि इस पूरे ब्रह्मांड में और विशेषकर हमारी पृथ्वी पर वायु (हवा) एक ही है। वायु तत्व के बिना जीवन की कल्पना असंभव है। लेकिन क्या हवा का हर जगह एक ही रूप और एक ही कार्य होता है ? बिल्कुल नहीं।

० प्राणवायु (ऑक्सीजन):- जब हम सांस लेते हैं, तो हम हवा से ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं जो हमारे जीवन को चलाती है।

० कार्बन डाइऑक्साइड:- जब हम सांस छोड़ते हैं, तो वही हवा कार्बन डाइऑक्साइड का रूप ले लेती है। पेड़-पौधे इसी हवा को ग्रहण करते हैं और हमारे लिए फिर से प्राणवायु छोड़ते हैं।

० सुगंध और दुर्गंध:- हवा जब किसी फूलों के बगीचे से होकर गुजरती है, तो वह सुगंधित हो जाती है और हमें आनंद देती है। वही हवा जब किसी गंदे स्थान या रासायनिक कचरे से टकराती है, तो वह दूषित और बदबूदार हो जाती है।

अब विचार कीजिए क्या हवाएं अलग-अलग हैं ? नहीं हवा मूल रूप से एक ही तत्व है, लेकिन परिस्थिति, संगति, दबाव और आवश्यकता के अनुसार उसके रूप, गुण और प्रभाव अलग-अलग हो जाते हैं।

ठीक इसी प्रकार, वह परमेश्वर, वह परमचेतना या परमात्मा भी मूल रूप से एक ही है। लेकिन जब ब्रह्मांड को चलाने, सृजन करने, पालन करने या संहार करने की बात आती है, तो वही एक शक्ति अलग-अलग रूपों में हमारे सामने प्रकट होती है।
  
2 पानी का उदाहरण, एक ही जल, भिन्न स्वाद।
आकाश से बरसने वाला पानी या पृथ्वी के भीतर मौजूद जल तत्व मूल रूप से एक ही है। लेकिन क्या हर जगह के पानी का स्वाद एक जैसा होता है ?
यदि आप किसी ऐसे क्षेत्र में जाते हैं जहाँ की मिट्टी में खनिज या नमक की मात्रा अधिक है, तो वहाँ का पानी खारा हो जाता है।
यदि आप किसी उपजाऊ और शुद्ध पहाड़ी क्षेत्र में जाते हैं, तो वहाँ का पानी मीठा और अमृत समान होता है।
यदि उसी पानी में आप गन्ने का रस मिला दें तो वह शरबत बन जाता है, और यदि उसमें कड़वी औषधि मिला दें तो वह काढ़ा बन जाता है।

पानी का अपना कोई रंग, रूप या स्वाद नहीं होता, वह जिस मिट्टी या तत्व के संपर्क में आता है, वैसा ही गुण अपना लेता है।
सनातन धर्म का दर्शन भी यही कहता है। ईश्वर एक ही है, जिसे वेदों में एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति (सत्य एक ही है, विद्वान उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं) कहा गया है। भक्त की जैसी भावना होती है, ईश्वर की शक्ति उसी रूप में उसके सामने प्रकट हो जाती है। ज्ञान की आवश्यकता होती है तो हम उसे सरस्वती के रूप में पूजते हैं, शक्ति की आवश्यकता होती है तो दुर्गा के रूप में, और धन-वैभव की आवश्यकता होती है तो लक्ष्मी के रूप में। रूप अनेक हैं, पर तत्व केवल एक ही है।

2 भगवान हैं, तो दिखाई क्यों नहीं देते ?
अब आते हैं दूसरे सबसे बड़े प्रश्न पर अगर भगवान कण-कण में हैं, सर्वत्र हैं, तो हमें दिखाई क्यों नहीं देते ? क्या बिना देखे किसी चीज़ पर विश्वास किया जा सकता है ?
आज का विज्ञान भी यह मानता है कि इस संसार में ऐसी अनगिनत चीज़ें हैं जो हमारे आस-पास मौजूद हैं, लेकिन हमारी नग्न आँखों (Naked Eyes) से दिखाई नहीं देतीं। भगवान के अस्तित्व को समझने के लिए भी हमें अपनी दृष्टि को थोड़ा गहरा करना होगा।

1 पानी और नमक का वैज्ञानिक उदाहरण।
मान लीजिए कि आप एक लोटा या कांच का गिलास पानी से भरते हैं। अब उसमें एक या दो चम्मच नमक डाल देते हैं और उसे अच्छी तरह हिलाकर मिला (Mix) देते हैं।
कुछ देर बाद जब नमक पूरी तरह पानी में घुल जाता है, तो क्या आपको उस पानी में नमक की एक भी डली या कण दिखाई देता है ? बिल्कुल नहीं। पानी पूरी तरह पारदर्शी दिखता है। लेकिन क्या पानी में नमक नहीं है ?
पढ़े-लिखे और समझदार लोग जानते हैं कि नमक उस पानी के कण-कण में, बूंद-बूंद में मौजूद है। भले ही वह आँखों से दिखाई नहीं दे रहा, लेकिन जैसे ही आप उस पानी की एक बूंद को अपनी जीभ पर रखेंगे, आपको नमक के होने का अहसास तुरंत हो जाएगा।

ईश्वर की स्थिति भी इस संसार में बिल्कुल वैसी ही है। वह इस ब्रह्मांड रूपी जल में नमक की तरह घुला हुआ है। वह सर्वत्र विराजमान है हवा में, पानी में, पेड़-पौधों में, औषधियों में और यहाँ तक कि हमारे भीतर भी। वह आँखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन जब कोई साधक अपने अनुभव, भक्ति और साधना की जीभ से उसे चखता है, तो उसे ईश्वर के होने का साक्षात अहसास हो जाता है।

2 हमारे भीतर की आत्मा।
भगवान को ढूंढने के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है। हमारे इस भौतिक शरीर के भीतर ही वह आत्मा रूप में विराजमान है। जब तक वह आत्मा हमारे भीतर है, यह शरीर बोल रहा है, सोच रहा है, चल रहा है और कर्म कर रहा है। लेकिन क्या किसी डॉक्टर या वैज्ञानिक ने आज तक उस आत्मा को आँखों से देखा है या किसी मशीन से पकड़ा है ? नहीं।
आत्मा दिखाई नहीं देती, लेकिन उसका प्रभाव पूरे शरीर पर दिखता है। जिस दिन वह आत्मा इस शरीर को छोड़ देती है, यह शरीर निष्प्राण (डेड बॉडी) हो जाता है। इसी तरह, परमात्मा इस पूरे ब्रह्मांड की आत्मा है। वह अदृश्य रहकर इस पूरी सृष्टि का संचालन कर रहा है।

3 क्या आज भी ईश्वर दर्शन देते हैं ? (भक्ति और पुकार का महत्व)।
इतिहास गवाह है कि जब-जब किसी ने परमात्मा को सच्चे दिल से, अपनी पूरी आत्मा से पुकारा है, तब-तब परमात्मा को प्रकट होना पड़ा है।

मीराबाई ने जब कृष्ण को अपनी आत्मा से पुकारा, तो ज़हर का प्याला भी अमृत बन गया और अंत में वे मूर्ति में समा गईं।

नरसी मेहता, कबीरदास, तुलसीदास जैसे अनगिनत संत हुए हैं, जिन्होंने परमात्मा की ऊर्जा का साक्षात अनुभव किया और दुनिया को दिखाया।
परमात्मा आज भी आने के लिए, दर्शन देने के लिए तैयार हैं। लेकिन शर्त सिर्फ इतनी है कि उन्हें बुलाने वाला चाहिए। हमारी पुकार में वो तड़प, वो निष्कपट भावना होनी चाहिए जो एक बच्चे की अपनी माँ के लिए होती है।

वर्तमान समय का भ्रम, मैं ही भगवान हूँ।
आज के सोशल मीडिया और कलयुग के इस दौर में एक अजीब सी प्रवृत्ति देखने को मिल रही है। इंटरनेट पर कई ऐसे वीडियो या लोग सामने आते हैं जो यह दावा करने लगते हैं कि मैं ही भगवान हूँ या मुझमें ही परमात्मा का अवतार हुआ है।
यहाँ हमें बहुत सावधान रहने और तर्क का उपयोग करने की आवश्यकता है। वास्तव में इसके पीछे का मनोविज्ञान क्या है ?
जब कोई साधक या संत किसी एक इष्ट (जैसे भगवान विष्णु या शिव) की घोर साधना करता है, मन और आत्मा को पूरी तरह एकाग्र कर लेता है, तो परमात्मा की ब्रह्मांडीय ऊर्जाएं (Cosmic Energies) उसके भीतर समाहित होने लगती हैं। उन दिव्य ऊर्जाओं के कारण उस व्यक्ति के भीतर कुछ अद्भुत शक्तियां या आकर्षण आ जाता है।
परंतु, कई बार साधक इस स्तर पर आकर एक बड़ी भूल कर बैठता है। ऊर्जाओं के प्रभाव और आम लोगों से मिलने वाले आदर के कारण उसके भीतर अहं भाव (Aham Bhava - Ego) जाग जाता है। वह यह भूल जाता है कि वह तो केवल एक माध्यम है, असली शक्ति तो परमात्मा की है। वह उस ऊर्जा को अपनी खुद की शक्ति मान बैठता है और खुद को ही भगवान घोषित कर देता है।

ओशो (Osho) की किताब का एक ऐतिहासिक उदाहरण।
इस इंसानी मनोविज्ञान को समझने के लिए एक बहुत ही सुंदर उदाहरण है। मान लीजिए किसी व्यक्ति ने ओशो (Osho) की किताबों को बहुत गहराई से, पूरे मन और आत्मा से पढ़ा। वह ओशो के विचारों में इतना डूब गया कि उसकी अपनी चेतना ओशो की चेतना से जुड़ गई।
अब उस व्यक्ति को धीरे-धीरे यह अहसास होने लगेगा कि उसके भीतर स्वयं ओशो आ गए हैं, और वह खुद को ही ओशो समझने लगेगा। यह मानसिक और आध्यात्मिक जुड़ाव का एक स्तर है, लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि वह व्यक्ति सचमुच ओशो बन गया है।
ठीक ऐसा ही आध्यात्मिक ऊर्जाओं के साथ होता है। परमात्मा की शक्तियां जब किसी के भीतर प्रकट होती हैं, तो व्यक्ति को विनम्र होना चाहिए, न कि अहंकारी होकर खुद को भगवान कहना चाहिए।

4 अवतार का रहस्य और सही समय की प्रतीक्षा।
सनातन परंपरा में अवतारवाद का बहुत बड़ा महत्व है। जब-जब धर्म की हानि होती है, परमात्मा किसी न किसी रूप में धरा पर आते हैं। आज के समय में भी चारों तरफ इस तरह का वातावरण और संकेत मिल रहे हैं कि परमात्मा की शक्तियां इस धरती पर काम कर रही हैं।
लेकिन जो लोग खुद को भगवान चिल्ला-चिल्ला कर बताते हैं, वे झूठे हैं। सच्चा परमात्मा कभी खुद आगे बढ़कर नहीं कहेगा कि मैं भगवान हूँ, जब तक कि उसका सही समय न आ जाए।

० महाभारत और भगवान कृष्ण का संदेश।
याद कीजिए द्वापर युग को। भगवान कृष्ण बचपन से ही लीलाएं कर रहे थे, कंस का वध किया, राजा बने, लेकिन उन्होंने कभी ढिंढोरा नहीं पीटा कि मैं ही ब्रह्मांड का स्वामी हूँ। उन्होंने सामान्य मनुष्यों की तरह जीवन जिया, मित्रता निभाई और कूटनीति की।

लेकिन जब सही समय आया महाभारत के युद्ध का मैदान, जहाँ अर्जुन कर्त्तव्यविमूढ़ होकर बैठ गया था। तब भगवान कृष्ण ने अपने विराट रूप का प्रदर्शन किया और 18 अध्यायों के माध्यम से भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान दिया। उन्होंने अर्जुन को आत्मज्ञान कराया और तब अर्जुन ने माना कि उसके सामने साक्षात परमेश्वर खड़े हैं।
जब परमात्मा का काम होना होता है, तो वे अंतिम समय में ही अपनी पहचान उजागर करते हैं। महाभारत का युद्ध केवल 18 दिन चला और उन 18 दिनों में ही सब कुछ बदल गया, पूरी सृष्टि का नक्शा बदल गया। इसलिए, परमात्मा जब भी पूर्ण रूप से प्रकट होंगे, वे बोलेंगे नहीं, बल्कि उनका कार्य बोलेगा। चंद दिनों या महीनों के भीतर ही अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना हो जाएगी। तब तक हमें धैर्य रखना चाहिए और खुद को परमात्मा का सेवक मानकर साधना करनी चाहिए।

निष्कर्ष।
ज्ञान को संजोना और साझा करना
यह पूरा संसार, यह प्रकृति ही परमात्मा का विराट रूप है। भगवान को देखने के लिए किसी जादुई शक्ति की जरूरत नहीं है। हम रोज सुबह जिस सूर्यदेव को देखते हैं, जो पूरी पृथ्वी को जीवन, ऊर्जा और प्रकाश दे रहे हैं, वे साक्षात परमात्मा का ही प्रत्यक्ष रूप हैं। हवा, पानी, पेड़-पौधे यह सब उसी एक परमचेतना के अलग-अलग रूप हैं।

यह ज्ञान कोई किताबी ज्ञान नहीं है, बल्कि यह हमारे अंतर्मन की साधना, शास्त्रों के स्वाध्याय और ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम से उपजा हुआ अनुभव है। जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियां आती हैं जब हमें लगता है कि हमें रुक जाना चाहिए, लेकिन परमात्मा का संकेत मिलते ही हमें अपने ज्ञान को समाज के साथ साझा करना चाहिए। ज्ञान को अपने पास दबाकर रखने से उसका महत्व समाप्त हो जाता है।

यदि आपको इस लेख में दिए गए तर्क, हवा और पानी के उदाहरण, और भगवान के अस्तित्व को लेकर दी गई व्याख्या तार्किक और दिल को छूने वाली लगी हो, तो अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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प्रमाण और संदर्भ (References & Sources)।
इस लेख में व्यक्त किए गए विचार और दार्शनिक तर्क निम्नलिखित सनातन ग्रंथों, सिद्धांतों और व्यावहारिक विज्ञान पर आधारित हैं।

० एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति (ऋग्वेद - 1.164.46):- सनातन धर्म में एक ही परमेश्वर के अनेक रूपों की व्याख्या ऋग्वेद के इस महावाक्य से प्रमाणित होती है, जिसका अर्थ है सत्य (ईश्वर) एक ही है, लेकिन विद्वान और ऋषि उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं।

० श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 4, श्लोक 7-8):- भगवान कृष्ण द्वारा अवतार लेने और धर्म की स्थापना के सिद्धांतों का प्रमाण गीता के यदा यदा ही धर्मस्य... श्लोक से मिलता है, जहाँ सही समय पर ईश्वर के प्रकट होने की बात कही गई है।

० श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय 10 - विभूति योग):- चराचर जगत, प्रकृति (जैसे सूर्य, वायु, जल) और कण-कण में भगवान की दिव्य ऊर्जा के वास होने का विस्तृत वर्णन गीता के 10वें अध्याय में मिलता है।

० व्यावहारिक विज्ञान और मनोविज्ञान:- लेख में दिए गए हवा, जल और नमक के उदाहरण सामान्य भौतिक विज्ञान (Physical Science) के नियमों और चेतना के मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों पर आधारित हैं।

डिस्क्लेमर (Disclaimer)।
साझा किए गए विचारों के संबंध में।
इस ब्लॉग पोस्ट और इससे जुड़े वीडियो में व्यक्त किए गए विचार लेखक/प्रस्तुतकर्ता के अपने व्यक्तिगत अध्ययन, आध्यात्मिक अनुभव, तार्किक चिंतन और सनातन धर्म के प्रति उनकी गहरी आस्था पर आधारित हैं। इनका उद्देश्य किसी भी व्यक्ति, संप्रदाय, जाति या धर्म की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है।

धार्मिक और दार्शनिक व्याख्या।
सनातन धर्म एक विशाल सागर है और इसके ग्रंथों की व्याख्या अलग-अलग विद्वानों द्वारा अपने-अपने दृष्टिकोण से की गई है। इस लेख में दिए गए उदाहरण (जैसे हवा, पानी और नमक) गूढ़ आध्यात्मिक रहस्यों को आम जनता के लिए सरल और सुलभ बनाने के उद्देश्य से दिए गए हैं। पाठक इन विचारों को अपने विवेक और समझ के आधार पर ग्रहण करने के लिए स्वतंत्र हैं।

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जय हो प्रकृति परमात्मा। जय हो सत्य सनातन।

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