प्रार्थना
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर:।
गुरुसाक्षात्परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नमः॥
ध्यानमूलं गुरोर्मूर्ति: पूजामूलं गुरु: पदम्।
मंत्रमूलं गुरोर्वक्यं मोक्षमूलं गुरु: कृपा॥
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पादं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बंध्यश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥
ब्रह्मान्नदं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं।
द्वन्द्वतीतं गगनसदृशं तत्वमस्यादिल्क्ष्यम्॥
एकं नित्यं विमलमचलं सर्वाधसाक्षिभूतं।
भवतीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि॥
अक्सर बाबा ऐसा कहते हैं कि गुरु बिन घोर अँधेरा है। गुरु के नुस्खे कुछ भी नहीं है मोक्ष नहीं है यह नहीं है वह नहीं है ऐसे बोल कर चाय-बालियां तोड़ते हैं तो उनके चक्कर में ना आओ आपको यही करना चाहिए कि अपने पति के साथ गुरु की तरह गुरु के पास कभी न जाएं अपने पति साथ में या अपने पति को बोलें और पति से ही शिक्षा ग्रहण करें सबसे बड़ा धर्म तो यही है कि पत्नी को अपने पति को ही गुरु बनाना चाहिए और अपने आज्ञा का पालन करना चाहिए
अगर किसी महिला को चोरी छुपे किसी बाबा को अपना गुरु बनाना चाहिए और बाबा अपनी चेली संस्थाएं हैं वह बाबा सही नहीं हैं उन्हें समाज से बाहर कर देना चाहिए।
महिलाओं को यह समझदारी का पात्र होना चाहिए कि अपने पति को बोलना चाहिए कि आप गुरु बना लो, हमारे गुरु होंगे पति के साथ ही पत्नी का यह धर्म होता है।
महिलाओं को मर्दों के पास जाकर देखना न चाहिए हिंदू धर्म को बदनाम करना है चली बनाओ बाबाओं ने।
भागवत में स्पष्ट लिखा है
(प्रथम खंड अ॰12 श्लोक 6 से 12 तक)
अपनी शील की रक्षा करें। थोड़ा सा सार्थक। अपने कर्मों को सीखें। श्रद्धा स्थान और इंद्रियों को अपने वश में रखें। स्त्री और राक्षस के वश में रहने वालों के साथ चाहिए हो, मित्र ही व्यवहार करें॥6॥
जो गृहस्थ नहीं है और ब्रह्मचर्य व्रत रखता है, उसे मित्र की चर्चा से ही अलग रहना चाहिए। इंद्रियां बड़ी बलवान है। यह प्रयास बेकार है उपकरण बनाने वालों के मन को भी खुशी करके खींचना है7॥
युवा ब्रह्मचारी संस्था गुरुपत्नी से बाल संतुष्टना, शरीर मलवाना, स्नान कराना, उबटन स्थापित करना, अन्य कार्य न करावे॥8॥
औरतें आगके समान हैं और पुरुष घीके घड़ेके समान। एकांत में तो अपनी कन्या के साथ भी नहीं रहना चाहिए। जब वह एकांत में न हो, तब भी आवश्यकता के अनुसार ही उसके पास का जन्मदिन होता है॥य॥
जब तक यह जीव आत्मसाक्षात्कार के द्वारा इन देह और इंद्रियोंको प्रतिमात्रा निश्चित करके स्वतंत्र नहीं हो जाता, तब तक 'मैं पुरुष हूं और यह स्त्री है'- यह द्वैत नहीं मिटता और तब तक यह भी निश्चित है कि यदि पुरुष स्त्रीके संसर्ग में रहेगा, तो उसका उनका भोग सुंदर हो जाएगा॥10॥
ये सब सील-रक्षादि गुण गृहस्थी और संन्यासी के लिए भी उपलब्ध हैं। गृहस्थ के लिए गुरुकुल में गुरु की सेवा-सुश्रुषा वैकल्पिक है। क्योंकि ॠतुगमनके कारण उसे वहां से अलग भी होना पड़ता है॥1॥
जो ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करें, उन्हें चाहिए कि वे सुरमा या तेल न लगाएं। उबटन न मलें। फनीके चित्र न बनावें। मांस और मद्यसे कोई संबंध नहीं। फूलों के हार, चंदन-फुलेल, चंदन और गहनों का त्याग कर॥12॥
कपटी गुरु और सच्चे गुरु
एक सुंदर बाल विधवा के घर अपने गुरु आये। विधवा देवी ने श्रद्धा भक्ति के साथ गुरु को दिया भोजन आदि मित्र। तदनन्तर उनके सामने धर्म उपदेश देने के लिए भेजा गया। गुरु के मन में उनके रूप-यौवन को देखकर पाप आ गया और उन्होंने अपने कपाट-जाल में झांकने के लिए भंती-भांती की युक्तियों से आत्म निवेदन का महत्वपूर्ण बतलाया और यह समझाने की कोशिश की कि जब वह उनके शिष्य हैं तो आत्म निवेदन करके अपना देह के द्वारा उसे अपने गुरु की सेवा करनी चाहिए। गुरु ने बहुत कुछ लिखा था, उन्होंने बहुत से तर्कों के सिद्धांतों के अनुसार प्रमाण दे-देकर यह सिद्ध कर दिया कि यदि ऐसा नहीं किया गया तो गुरु-कृपा नहीं होगी और गुरु-कृपा न होने से नरक की प्राप्ति होगी।
विधवा देवी बड़ी बुद्धिमती, विचार सिला और अपने सती-धर्म की रक्षा में तत्पर थी। वह गुरु के अपमान अभिप्राय को समझ गया। उसने बड़ी नम्रता के साथ कहा- 'गुरुजी! आपकी कृपा से मैं इतना तो जानता हूं कि गुरु की सेवा करना शिष्याका परम धर्म है, लेकिन सौभाग्य की बात है कि मुझे सेवा का कोई अनुभव नहीं है। इसी से मैं यथासाध्य गुरु के चरण कमलों को हृदय में विराजित करके अपनी चक्षु कर्णादि इंद्रियों से उनकी सेवा करता हूं।
आंखों से उनके स्वरूप के दर्शन, कानों से उनके उपदेशामृत का पान आदि करती हूं। सिर्फ दो नीच इंद्रियोंको, जिनसे मल-मूत्र बहा करता है, मैंने सेवा में नहीं लगाया; क्योंकि गुरु की सेवा में उन्हीं चीजों को लगाना चाहिए जो पवित्र हों। मल-मूत्र के गड्ढे में में गुरु को कैसे बिठाऊॅ? इसीसे उन गंदे अंगों को कपड़ों से ढके रखती हूं कि कहीं पवित्र गुरु-सेवा में बाधा न आ जाए। इतने पर भी यदि गुरु-कृपा न हो तो क्या उपाय है? पर सच्चे गुरु ऐसा क्यों करने लगे? जो गुरु मल-मूत्र की चाह करते हैं, जो गुरु भक्ति रूपी सुधा पाकर भी मुत्राशयकी ओर ललचायी आंखों से देखते हैं, जो गुरु शिष्या के चेहरे की ओर दया-दृष्टि से न देखकर नरकके मुख्यद्वार-नरक बहनेवाली दुर्गंध युक्त नालियों की ओर ताकते हैं, ऐसे गुरु के प्रति आत्म निवेदन न करके उनके मुंहपर तो कालिख ही पोतनी चाहिए और झाङुओ से उनका सत्कार करना चाहिए। गुरु जी चुपचाप चल दिए।
मेरा नाम ओमप्रकाश शर्मा है मेरी प्रोफाइल। फेसबुक
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